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श्रीराम के अनन्य भक्त श्री हनुमान

कलयुग में हनुमानजी की भक्ति सबसे सरल और जल्द ही फल प्रदान करने वाली मानी गई है। श्रीराम के अनन्य भक्त श्री हनुमान अपने भक्तों और धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोगों की हर कदम मदद करते हैं। सीता माता के दिए वरदान के प्रभाव से वे अमर हैं और किसी ना किसी रूप में अपने भक्तों के साथ रहते हैं। हनुमानजी को मनाने के लिए सबसे सरल उपाय है हनुमान चालीसा का नित्य पाठ। हनुमानजी की यह स्तुति का सबसे सरल और सुरीली है। इसके पाठ से भक्त को असीम आनंद की प्राप्ति होती है। तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा बहुत प्रभावकारी है। इसकी सभी चौपाइयां मंत्र ही हैं। जिनके निरंतर जप से ये सिद्ध हो जाती है और पवनपुत्र हनुमानजी की कृपा प्राप्त हो जाती है। यदि आप मानसिक अशांति झेल रहे हैं, कार्य की अधिकता से मन अस्थिर बना हुआ है, घर-परिवार की कोई समस्यां सता रही है तो ऐसे में सभी ज्ञानी विद्वानों द्वारा हनुमान चालीसा के पाठ की सलाह दी जाती है। इसके पाठ से चमत्कारिक फल प्राप्त होता है, इसमें को शंका या संदेह नहीं है। यह बात लोगों ने साक्षात् अनुभव की होगी की हनुमान चालीसा के पाठ से मन को शांति और कई समस्याओं के हल स्व...

कामाख्या शक्तिपीठ का विशेष महत्व

हिन्दू धर्म में देवी के 51 शक्तिपीठों में से कामाख्या या कामरूप शक्तिपीठ का विशेष महत्व है । यह भारत की पूर्व-उत्तर दिशा में असम प्रदेश के गुवाहाटी में स्थित होकर कामाख्या देवी मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। पुराणों के अनुसार यह देवी का महाक्षेत्र है। यह मन्दिर नीलगिरी नामक पहाड़ी पर स्थित है। यह क्षेत्र कामरूप भी कहलाता है। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी कृपा से कामदेव को अपना मूल रूप प्राप्त हुआ। देश में स्थित विभिन्न पीठों में से कामाख्या पीठ को महापीठ माना जाता है। इस मंदिर में 12 स्तम्भों के मध्य देवी की विशाल मूर्ति है। मंदिर एक गुफा में स्थित है। यहां जाने का मार्ग पथरीला है, जिसे नरकासुर पथ भी कहा जाता है। मंदिर के पास ही एक कुण्ड है, जिसे सौभाग्य कुण्ड कहते हैं। इस स्थान को योनि पीठ के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि यहां देवी की देह का योनि भाग गिरा था। यहां पर देवी का शक्ति स्वरूप कामाख्या है एवं भैरव का रूप उमानाथ या उमानंद है। उमानंद को भक्त माता का रक्षक मानते हैं। कथा- शिव जब सती के मृत देह लेकर वियोगी भाव से घूम रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनका वियोग दूर करने के लि...

मंगलकारी रूप मां कालरात्रि

नवरात्रि में शक्ति आराधना तन-मन को संयम और अनुशासन द्वारा साधकर जीवन को आनंद और सुख से बिताने का संदेश देती है। नवरात्रि धर्म और ईश्वर से जुड़कर सफल जीवन और उसके लिए किए जाने वाले प्रयासों के लिए शक्ति संचय का अहम और शुभ काल है। चैत्र शुक्ल नवरात्रि की सातवीं रात सिद्धि की रात्रि मानी गई है। क्योंकि इस दिन आदिशक्ति दुर्गा के तामसी किंतु मंगलकारी रूप कालरात्रि की उपासना की जाती है। यह शक्ति और रात्रि सांसारिक कामनाओं के साथ तंत्र साधनाओं की सिद्धि की लिए भी अचूक मानी गई है। मां कालरात्रि का स्वरूप जितना भयानक है, उतना ही मंगलकारी और शुभ भी है। माता की उपासना जीवन से जुड़े हर भय, संशय और चिंता का नाश करने के साथ-साथ सभी सिद्धियां, सुख, साहस और कौशल देने वाली है। सरल शब्दों में मां कालरात्रि की भक्ति सफलता की राह में आने वाली मानसिक और व्यावहारिक बाधाओं को दूर कर देती है। मां कालरात्रि संकटमोचक शक्ति के रूप में पूजनीय है। अगर आप भी परेशानियों का सामना कर रहें है तो नवरात्रि के सातवें दिन (30 मार्च) को मां कालरात्रि के इस मंत्र का देवी पूजा के दौरान जरूर जप करें - - मां कालरात्रि की...

भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण

1 अप्रैल को राम नवमी है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन श्रीराम का जन्म हुआ था। ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम नीले रंग के थे वहीं शास्त्रों में श्रीकृष्ण को काले रंग का बताया है। यह सुनकर अक्सर हमारे मन में यह सवाल उठता है कि हमारे भगवानों के रंग-रूप इतने अलग क्यों हैं। भगवान कृष्ण का काला रंग तो फिर भी समझ में आता है लेकिन भगवान राम को नील वर्ण भी कहा जाता है। क्या वाकई भगवान राम नीले रंग के थे, किसी इंसान का नीला रंग कैसे हो सकता है? वहीं काले रंग के कृष्ण इतने आकर्षक कैसे थे? इन भगवानों के रंग-रूप के पीछे क्या रहस्य है। राम के नीले वर्ण और कृष्ण के काले रंग के पीछे एक दार्शनिक रहस्य है। भगवानों का यह रंग उनके व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। दरअसल इसके पीछे भाव है कि भगवान का व्यक्तित्व अनंत है। उसकी कोई सीमा नहीं है, वे अनंत है। ये अनंतता का भाव हमें आकाश से मिलता है। आकाश की कोई सीमा नहीं है। वह अंतहीन है। राम और कृष्ण के रंग इसी आकाश की अनंतता के प्रतीक हैं। राम का जन्म दिन में हुआ था। दिन के समय का आकाश का रंग नीला होता है। इसी तरह कृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ था और रात के समय...

नवरात्रि: भगवान राम की आराधना

नवरात्रि में शक्ति की उपासना के साथ ही वासंतिक नवरात्र में भगवान राम की भी आराधना की जाती है। असल में शक्ति और श्रीराम उपासना के पीछे संदेश यह भी है कि जीवन में कामयाबी को छूने के लिए बेहतर व मर्यादित चरित्र व व्यक्तित्व की शक्ति भी जरूरी है। इस तरह नवरात्रि व रामनवमी शक्ति के साथ मर्यादा के महत्व की ओर इशारा करती है। खासतौर पर शक्ति के मद में रिश्तों, संबंधों और पद की मर्यादा न भूलकर दुर्गति से बचना ही दुर्गा पूजा की सार्थकता भी है। जगतजननी का यही स्वरूप व्यावहारिक जीवन में स्त्री को माना जाता है। यही कारण है कि वेद-पुराणों में 16 स्त्रियों को मां के समान दृष्टि रखने और सम्मान देने का महत्व बताया गया है। कौन हैं ये स्त्रियां जानिए - स्तनदायी गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया। अभीष्टदेवपत्नी च पितु: पत्नी च कन्यका।। सगर्भजा या भगिनी पुत्रपत्त्नी प्रियाप्रसू:। मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा।। मातु: पितुश्र्च भगिनी मातुलानी तथैव च। जनानां वेदविहिता मातर: षोडश स्मृता:।। जिसका अर्थ है कि वेद में नीचे बताई 16 स्त्रियां मनुष्य के लिए माताएं हैं- स्तन या दूध पिलाने व...

पवनपुत्र हनुमान के गुण से सीख

श्री हनुमान के चरित्र में अपनत्व का विलक्षण भाव देखने को मिलता है। श्री हनुमान ने इसी गुण के बूते हर स्थिति, स्थान और संबंधों को अनुकूल बना लिया। श्री हनुमान ने अपनेपन के इस भाव से ही न केवल स्वयं प्रभु राम की कृपा और माता सीता से अचूक सिद्धियां व अनमोल निधियां पाई, बल्कि दूसरों पर भी कृपा बरसाई। इस तरह पवनपुत्र हनुमान के इस गुण से सीख यही मिलती है कि जीवन में मुसीबतों को पछाडऩा है तो हालात से मुंह मोडऩे या रिश्तों से अलगाव के बजाए अपनेपन यानी तालमेल, प्रेम व जुड़ाव के सूत्र को अपनाएं। क्योंकि अलगाव में क्षण भर का आवेग लंबी पीड़ा दे सकता है, किंतु जुड़ाव वक्त लेकर भी लंबा सुख और सफलता देने वाला होता है। ऐसे मंगलमूर्ति श्री हनुमान के ध्यान से जीवन मंगलमय बनाने के लिए बहुत ही शुभ घड़ी मानी गई है- नवरात्रि में रामनवमी, मंगलवार, शनिवार या हनुमान जयंती। इस दिनों हनुमान का ध्यान ग्रह, मन, कर्म व विचारों के दोषों का शमन कर सुख-सफलता देने वाला माना गया है। जिसके लिए हनुमान के विशेष मंत्र स्तुति के ध्यान का महत्व बताया गया है। जानते हैं यह विशेष मंत्र और सरल पूजा विधि - - स्नान के बाद श्री ...

हनुमान चालीसा के दो दोहों

गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की शुरुआत दो दोहों और गुरु के स्मरण से की है। लिखा है कि- श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिक सुमिरौ पवन कुमार। बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहि हरहु क्लेश विकार।। अर्थ है - श्री गुरु के चरण कमलों की रज से अपने मन रूपी दर्पण को साफ कर मैं श्री रघुनाथ के उस पावन यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फलों यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है। तुलसीदासजी ने दोहे की शुरुआत पहले गुरु को स्मरण कर की है। दरअसल, व्यावहारिक रूप से धूल से दर्पण साफ नहीं होता, बल्कि दर्पण से धूल साफ होती है। किंतु तुलसीदासजी की इस बात में भी जीवन को साधने के गहरे सूत्र हैं। उनका संकेत है कि जिस तरह हम दर्पण देखकर स्वयं के सौंदर्य को बेहतर ढंग से व्यवस्थित कर बाहर जाते हैं। ठीक उसी तरह से जीवन से जुड़े हर विषय की शुरुआत के लिए मन का साफ, मजबूत और संतुलित होना अहम है। जिसके लिये सत्य व ज्ञान से जुडऩे की अहमियत है, जिनकी यहां गुरु के रूप वंदना और आवाहन कर अहमियत बताई गई है। इसी तरह दोहे में श्री हनु...